एक वकील के तौर पर जब मैं हर रोज़ अदालत में हक़ और इंसाफ की दलीलें रखता हूँ, तो अक्सर मेरे ज़ेहन में यह खयाल आता है कि गुलाम भारत में, बिना किसी खौफ के, अंग्रेजी हुकूमत की सबसे बड़ी अदालतों और सत्ता को चुनौती देने का जज़्बा कैसा रहा होगा। आज जब हम आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं, तो हमें उन शख्सियतों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने अपने खून-पसीने से इस आज़ादी की बुनियाद रखी। उन्हीं में से एक बेहद कद्दावर और बेबाक नाम है— मौलाना मोहम्मद अली जौहर।
वो महज़ एक राजनेता नहीं थे। अगर आप उनके जीवन को करीब से देखें, तो पाएंगे कि वे एक प्रखर पत्रकार, एक निडर वक्ता, एक दूरदर्शी शिक्षाविद और सबसे बढ़कर— ज़ुल्म के खिलाफ एक ऐसी आवाज़ थे, जिसे जेल की सलाखें भी कभी दबा नहीं सकीं।
रामपुर में 10 दिसंबर 1878 को जन्मे मोहम्मद अली जौहर ने शुरुआती तालीम के बाद इंग्लैंड के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय (लिंकन कॉलेज) से आधुनिक इतिहास की पढ़ाई की। वे चाहते तो किसी भी बड़े ओहदे पर बैठकर एक आरामदायक सरकारी ज़िंदगी गुज़ार सकते थे। लेकिन उनका मक़सद अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी अवाम के लिए जीना था।
उन्होंने सरकारी नौकरी की जंजीरों को तोड़कर कलम को अपना हथियार बनाया। 1911 में अंग्रेजी अखबार ‘The Comrade’ और 1913 में उर्दू दैनिक ‘Hamdard’ निकालकर उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ सीधा मुक़दमा जनता की अदालत में पेश कर दिया। उनकी लेखनी में इतनी आग थी कि ब्रिटिश सरकार अक्सर बौखला जाती थी, जिस वजह से उन्हें कई बार जेल की सख्त यातनाएं भी सहनी पड़ीं।
एक दिलचस्प बात जो अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़े इस कोट-पैंट पहनने वाले शख्स को लोग ‘मौलाना’ क्यों कहते थे? असल में, यह उपाधि उन्हें किसी मदरसे या विश्वविद्यालय ने नहीं दी थी। यह उनके इल्म (ज्ञान), उनके त्याग और उनके नेतृत्व को देखकर भारत की अवाम और उस दौर के बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा दिया गया प्यार और सम्मान था। ‘मौलाना’ यानी हमारा रहबर, हमारा मार्गदर्शक— और वे वाक़ई में पूरे मुल्क के रहबर थे।
मोहम्मद अली जौहर की सियासत किसी एक दायरे में सिमटी हुई नहीं थी। एक तरफ उन्होंने अपने भाई शौकत अली के साथ मिलकर ‘खिलाफत आंदोलन’ का नेतृत्व किया और मुसलमानों को एक राजनीतिक चेतना दी, तो दूसरी तरफ महात्मा गांधी के साथ ‘असहयोग आंदोलन’ में कंधे से कंधा मिलाकर चले। हिंदू-मुस्लिम एकता और उनके व्यापक विज़न का ही नतीजा था कि 1923 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।
उन्होंने साबित किया कि आप अपने समुदाय के हक़ की बात करते हुए भी एक सच्चे और पक्के देश प्रेमी हो सकते हैं।
मैं हमेशा मानता हूँ कि महज़ अदालतें या सरकारें समाज नहीं बदल सकतीं; असली बदलाव तालीम से आता है। मोहम्मद अली जौहर भी इसी सोच के पैरोकार थे। इसी मक़सद से उन्होंने 29 अक्टूबर 1920 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव रखी और इसके पहले कुलपति (Vice-Chancellor) बने।
उनका विज़न साफ था— एक ऐसी शैक्षणिक संस्था, जो अंग्रेजों की मोहताज न हो और जो युवाओं में आज़ाद सोच और देश प्रेम पैदा करे। आज जामिया मुल्क के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक है, जो उनकी दूरंदेशी का जीता-जागता सुबूत है।
1930 में जब लंदन में ‘पहला गोलमेज सम्मेलन’ हुआ, तब मौलाना जौहर गंभीर रूप से बीमार थे। लेकिन जब मुल्क के मुस्तकबिल की बात आई, तो वे पीछे नहीं हटे। लंदन जाकर उन्होंने जो भाषण दिया, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। भरी सभा में अंग्रेजों की आंखों में आंखें डालकर उन्होंने अपनी आख़िरी दलील पेश की:
“मैं एक आज़ाद मुल्क में वापस जाना चाहता हूँ। अगर आप हमें आज़ादी नहीं दे सकते, तो आपको मुझे यहीं एक कब्र के लिए जगह देनी होगी, क्योंकि मैं किसी गुलाम मुल्क में वापस नहीं लौटूंगा।”
उनकी यह बात सच साबित हुई। 4 जनवरी 1931 को लंदन में उनका इंतकाल हो गया और उनकी वसीयत के मुताबिक, उन्हें आज़ाद ज़मीन— यरुशलम (Jerusalem) के मस्जिद अल-अक्सा परिसर में पूरे सम्मान के साथ दफनाया गया।
आज जब हम अपने इर्द-गिर्द समाज को देखते हैं, तो मौलाना मोहम्मद अली जौहर की ज़िंदगी हमें बहुत कुछ सिखाती है। उनका जीवन हमें यह सबक देता है कि अगर आपका मक़सद नेक है, तो आपको हक़ के लिए आवाज़ उठाने से कोई नहीं रोक सकता।
चाहे मेरी वकालत का पेशा हो, या ‘नया कारवां’ के ज़रिए सामाजिक जागरूकता और लोगों की मदद करने का प्रयास— मुझे हमेशा ऐसी ही अज़ीम शख्सियतों से यह प्रेरणा मिलती है कि समाज में असली बदलाव तब आता है, जब हम बिना डरे अपने हिस्से का संघर्ष पूरी ईमानदारी से करते हैं।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक ऐसा जज़्बा हैं, जो हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेगा।
Author:
Aftab Fazil
Delhi High Court
मोबाइल न० 9015181526




इतनी अच्छी सोच वाले मौलाना मोहम्मद अली जौहर को सलाम. हम भी ऐसे ही देश के लोगों के लिए कुछ अच्छा काम करेगें…